Valmiki Ramayana Aranya Kand Sarga 61 : श्रीराम का विलाप करते हुए वृक्षों से सीता का पता पूछना, भ्रम में पड़ना
Valmiki Ramayana Aranya Kand Sarga 61 : श्रीराम का विलाप करते हुए वृक्षों से सीता का पता पूछना, भ्रम में पड़ना
Valmiki Ramayana Aranya Kand Sarga 61 :वाल्मीकि रामायण के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि लक्ष्मण जी ने राम को बताया कि आखिर वो क्यों माता सीता को छोड़कर कुटिया से दूर आये
Valmiki Ramayana Aranya Kand Sarga 61 :वाल्मीकि रामायण के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि लक्ष्मण जी ने राम को बताया कि आखिर वो क्यों माता सीता को छोड़कर कुटिया से दूर आये। रघुनन्दन बड़े वेग से इधर-उधर चक्कर लगाने और हाथ-पैर चलाने लगे। उन्होंने वहाँ जहाँ-तहाँ बनी हुई एक-एक पर्णशाला को चारों ओर से देख डाला, किंतु उस समय उसे सीता से सूनी ही पाया। सब ओर मृगचर्म और कुश बिखरे हुए थे। चटाइयाँ अस्त-व्यस्त पड़ी थीं। पर्णशाला को सूनी देख भगवान् श्रीराम बारंबार विलाप करने लगे। सीता को किसी ने हर तो नहीं लिया। उसकी मृत्यु तो नहीं हो गयी अथवा वह खो तो नहीं गयी या किसी राक्षस ने उसे खा तो नहीं लिया।
Valmiki Ramayana Aranya Kand Sarga 61 : श्रीराम का विलाप करते हुए वृक्षों से सीता का पता पूछना, भ्रम में पड़ना
श्रीरामचन्द्रजी ने प्रयत्नपूर्वक अपनी प्रिय पत्नी सीता को वन में चारों ओर ढूँढा, किंतु कहीं भी उनका पता न लगा। शोक के कारण श्रीमान् राम की आँखें लाल हो गयीं। वे उन्मत्त के समान दिखायी देने लगे। इतने ही में उनको भ्रम हुआ कि सीता उधर भागकर छिप रही है, तब वे बोले , प्रिये ! क्यों भागी जा रही हो? कमललोचने ! निश्चय ही मैंने तुम्हें देख लिया है। तुम वृक्षों की ओट में अपने-आपको छिपाकर मुझसे बात क्यों नहीं करती हो? क्या तुम्हें मुझपर दया नहीं आती है। अधिक हास-परिहास करने का तुम्हारा स्वभाव तो नहीं था, फिर किसलिये मेरी उपेक्षा करती हो?उस मनोहर मुसकानवाली सीता को राक्षसों ने मार डाला, अन्यथा इस तरह संकटमें पड़े हुए की वह कदापि उपेक्षा नहीं कर सकती थी। जान पड़ता है कि मांसभक्षी राक्षसों ने मुझसे बिछुड़ी हुई मेरी भोली-भाली प्रिया मैथिली को उसके सारे अङ्ग बाँटकर खा लिया। सुन्दर दाँत, मनोहर ओष्ठ, सुघड़ नासिका से युक्त तथा रुचिर कुण्डलों से अलंकृत वह पूर्ण चन्द्रमा के समान अभिराम मुख राक्षसों का ग्रास बनकर निश्चय ही अपनी प्रभा खो बैठा होगा।
अपनी प्रियतमा की खोज करते हए वे कभी-कभी पागलों की-सी चेष्टा करने लगते थे। उन्होंने बड़ी दौड़-धूप करके कहीं भी विश्राम न करते हुए वनों, नदियों, पर्वतों, पहाड़ी झरनों और विभिन्न काननों में घूम-घूमकर अन्वेषण किया। उस समय मिथिलेशकुमारी को ढूँढ़ने के लिये वे उस विशाल एवं विस्तृत वन में गये और सब में चक्कर लगाकर थक गये तो भी निराश नहीं हुए

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