Bhagwat Katha (श्रीमद् भागवत कथा)
नभः-स्पृशम्-आकाश को स्पर्श करता हुआ; दीप्तम्-प्रकाशित; अनेक-कई; वर्णम्-रंग; व्यात्त-खुले हुए; अननम्-मुख; दीप्त-प्रदीप्त; विशाल-बड़े; नेत्रम्-आँखें; दृष्टवा-देखकर; हि-निश्चय ही; त्वाम्-आपको; प्रव्यथित:-अन्तः-आत्मा मेरा हृदय थर-थर कांप रहा है; धृतिम्-दृढ़ता से; न-नहीं; विन्दामि-पाता हूँ; शमम्-मानसिक शान्ति को; च-भी; विष्णो-भगवान विष्णु। अर्थ - हे विष्णु ! आकाश की सभी दिशाओं को छूता हुआ दैदीप्यमान, अनेक रंगों वाले, फैले हुए विशाल मुख और अग्नि के समान प्रज्वल्लित नेत्र वाले आपके इस संहारक रूप को देखकर मेरी अंतरात्मा तक कांप रही है तथा भय से व्याकुल मुझे न धैर्य है और न ही शांति। व्याख्या - इस समय अर्जुन श्री कृष्ण के विराट स्वरुप के उग्र रूप का दर्शन कर रहे है और जैसा अर्जुन ने पिछले श्लोक में कहा कि उन्हें भय भी लग रहा है। अर्जुन ने अब पहले से विपरीत बात कही है। वो कहते है, 'नभः स्पृशं दीप्तमनेकवर्णं' यानी कि प्रभु आपका शरीर आकाश को स्पर्श कर रहा है। यानी कि अब अर्जुन उस विराट स्वरुप की लंबाई को देख रहे है। इसका अर्थ हम यह भी ले सकते है कि जीवात्मा की दृष्टि जहां तक जाती है वह उस...