Valmiki Ramayana Aranya Kand Sarga 58 : श्रीराम का मार्ग में अपशकुन देखकर चिन्तित होना, लक्ष्मण से मिलकर सीता

 Valmiki Ramayana Aranya Kand Sarga 58 : श्रीराम का मार्ग में अपशकुन देखकर चिन्तित होना, लक्ष्मण से मिलकर सीता

Valmiki Ramayana Aranya Kand Sarga 58 वाल्मीकि रामायण के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि ब्रह्मा जी के कहने पर इंद्र ने माता सीता को एक दिव्य हविष्य प्रदान किया जिससे फिर उन्हें कभी भूख नहीं लगे

Valmiki Ramayana Aranya Kand Sarga 58


Valmiki Ramayana Aranya Kand Sarga 58 वाल्मीकि रामायण के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि ब्रह्मा जी के कहने पर इंद्र ने माता सीता को एक दिव्य हविष्य प्रदान किया जिससे फिर उन्हें कभी भूख नहीं लगे। इधर मृगरूप से विचरते हुए उस इच्छानुसार रूप धारण करने वाले राक्षस मारीच का वध करके श्रीरामचन्द्रजी तुरंत ही आश्रम के मार्ग पर लौटे। वे सीता को देखने के लिये जल्दी-जल्दी पैर बढ़ाते हुए आ रहे थे। इतने ही में पीछे की ओर से एक सियारिन बड़े कठोर स्वर में चीत्कार करने लगी। गीदड़ी के उस स्वर से श्रीरामचन्द्रजी के मन में कुछ शङ्का हुई। उसका स्वर बड़ा ही भयंकर तथा रोंगटे खड़े कर देने वाला था। उसका अनुभव करके वे बड़ी चिन्ता में पड़ गये। 

Valmiki Ramayana Aranya Kand Sarga 58 : श्रीराम का मार्ग में अपशकुन देखकर चिन्तित होना, लक्ष्मण से मिलकर सीता की चिंता करना 


वे मन-ही-मन कहने लगे, मारीच ने जान-बूझकर मेरे स्वर का अनुसरण करते हुए जो आर्त-पुकार की थी, वह इसलिये कि शायद इसे लक्ष्मण सुन सकें। लक्ष्मण वह स्वर सुनते ही सीता के ही भेजने पर उसे अकेली छोड़कर तुरंत मेरे पास यहाँ पहुँचने के लिये चल देंगे।  वन में हम दोनों भाइयों के आश्रम से अलग हो जाने पर क्या सीता सकुशल वहाँ रह सकेंगी? जनस्थान में जो राक्षसों का संहार हुआ है, उसके कारण सारे राक्षस मुझसे वैर बाँधे ही हुए हैं। 

उनका मन बहुत दुःखी था। वे दीन हो रहे थे। उसी अवस्था में वन के मृग और पक्षी उन्हें बाँयें रखते हुए वहाँ आये और भयङ्कर स्वर में अपनी बोली बोलने लगे। उन महाभयङ्कर अपशकुनों को देखकर श्रीरामचन्द्रजी तुरंत ही बड़े वेग से अपने आश्रम की ओर लौटे। इतने ही में उन्हें लक्ष्मण आते दिखायी दिये। उनकी कान्ति फीकी पड़ गयी थी। थोड़ी ही देर में निकट आकर लक्ष्मण श्रीरामचन्द्रजी से मिले। 

लक्ष्मण का बायाँ हाथ पकड़कर रघुनन्दन आर्त से हो गये और पहले कठोर तथा अन्त में मधुर वाणी द्वारा इस प्रकार बोले, यह तुमने बहुत बुरा किया, जो सीता को अकेली छोड़कर यहाँ चले आये। क्या वहाँ सीता सकुशल होगी? क्या हम लोग जीती-जागती हुई जनक दुलारी सीता को पूर्णतः स्वस्थ एवं सकुशल पा सकेंगे? मेरा मन अत्यन्त दीन और अप्रसन्न हो रहा है। मेरी बायीं आँख फड़क रही है, इससे जान पड़ता है, निःसंदेह आश्रम पर सीता नहीं है। उसे कोई हर ले गया या वह मारी गयी।


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